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कहा भाग रहो हो, तनिक ठहर जाओ

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तुम किसको ढूढ़ रहो हो, अनावश्यक किधर भटक रहो हो? ठहर जाओ । जिसे तुम ढूढ़ने जा रहे हो, वह वहां है हि नहीं, तो मिलेगा कैसे, फिर तुम कहोगे कि मैंने इतना सारा यत्न किया, फिर भी मैंने उसे नहीं पाया। जीवन व्यर्थ हो गया। व्यर्थ की भाग-दौड़ हो गई। हर तरफ, हर प्रयत्न में, मुझे निराशा ही निराशा हाथ लगी।     तुम समझ रहो कि तुम चल रहे हो, आगे बढ़ रहे हो, लोग तुमसे पीछे छूटते जा रहे है । मंजिल को तुम जल्द ही पा  लोगे, नहीं, यह तुम्हारा भ्रम है। तुम्हारी अंततः मंजिल चलने से नहीं, बल्कि अपने-आप में ठहर जाने से प्राप्त होगी।  तुम सुख की प्राप्ति के लिए, न जाने कहा-कहा जाते हो, क्या-क्या करते हो। तुम्हे कुछ क्षण के लिए भ्रम होता है कि तुम सुख की प्राप्ति कर रहे हो, लेकिन तुम्हे यह आभास नहीं होता कि इस क्षणिक सुख की पटल पर तुम शाश्वत दुःख की विजारोपण कर रहे हो ।  ईश्वर की प्राप्ति के लिए तुम तीर्थ  जाते हो, धन खर्च करते हो, समय खर्च करते हो, लेकिन ईश्वर मिलने की बात तो दूर, तुम्हे तो वहां  ईश्वर का एहसास भी नहीं होता। गलत विधि अपना रहे हो...