काली, दुर्गा और पार्वती - एक ही शक्ति के तीन विभिन रूप क्यों?

काली, दुर्गा और पार्वती ये तीनो ही शक्ति के विभिन्न  रूप है। शक्ति भगवान शिव की अर्धागिनिं है। 

माँ दुर्गा की पूजा हर साल फसल कटने से पहले की जाती है।दुर्गा का आह्वाहन महिषासुर नामक एक राक्षस का वध करने के लिए किया गया था।

 महिषासुर, ब्रह्मा से  वरदान पाने के लिए घोर  तपस्या करता है। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा महिषासुर को वरदान देते है कि - किसी भी पुरुष के हाथो उसकी पराजय नहीं होंगी। यह वरदान पाकर महिषासुर बहुत खुश होता कि  उसको तीनो लोको में कोई परास्त नहीं कर सकता  अपने इस वरदान का लाभ उठाकर तीनो लोको में अपना अत्याचार फैलाता  है।

सभी देवता भगवान् शिव के पास जाते है। शिव और सभी देवता अपनी-अपनी शक्ति से दुर्गा को सुशोभित  करते है, और अपना अस्त्र-शस्त्र  देते है, ताकि महिषासुर का वध किया जा सके। अन्तत: दुर्गा महिषासुर पर विजय प्राप्त कर लेती है। यह हमने पुराणो और कथाओ में पढ़ा और सुना है। प्रत्येक पर्व और पौराणिक कथा एक सन्देश से जुडी होती है।
प्रश्न उठता है कि  एक ही शक्ति के अनेक रूप और कार्य क्यों है? देखते है यह कथा हमें  क्या सन्देश दे रही है।
    
महिषासुर द्वारा घोर तपस्या, उसकी आत्म-बल और दृढ़ता को दर्शता है। वह अपने तपस्या से अजेय शक्ति भी प्राप्त करता है। लेकिन अपने शक्ति का उपयोग अधर्म कार्यो में नष्ट करता है। इसीलिए इसे असुरी शक्ति कहते है, और उसका उपयोग करनेवाला असुर। शक्ति अच्छी या बुरी नहीं होती, उसका इस्तेमाल करने वाला अच्छा या बुरा होता है। 

शक्ति से ही शक्ति को नष्ट किया जा सकता है। दुर्गा का प्रदुभाव देवताओ के शक्ति से हुआ। असुरी शक्ति का विनाश करने के लिए  दैविक शक्ति का असुरी शक्ति से ज्यादा शक्तिशाली होना जरुरी है। इसीलिए अनेक देवताओ ने अपनी-अपनी शक्ति दुर्गा को दिये।

आरंभ में, काली,जिनका रंग काला, नग्न शरीर, बिखरे बाल, गले में मानव खोपड़ी का माला, जिह्वा बाहर निकली हुईहाथ में  खंजर लिए बहुत ही भयानक और खून की प्यासी दिखती है। ध्यान दे, जो काली के हाथ में खंजर है, वह आक्रामक तरीके से पकड़ा हुआ है। वह पुरे सृष्टि को नष्ट करने निकली है। 

वह शिव से शादी करना चाहती है, मगर शिव के इंकार से, वह काली का रूप धारण कर शिव को जगाने और अपना हक जताने के लिए, शिव के शरीर पर नृत्य करती है। काली के इस मंशा और देवताओ के अनुरोध से शिव अपना ध्यान तोड़ते है, और शक्ति से शादी करने का वादा करते है। 

शक्ति खुश हो जाती है, और दुर्गा बन जाती है। दुर्गा सुसंस्कृत हो जाती है। लाल  वस्त्र, सुनहरा रंग, बाल सजे और सवरे  हुए, लेकिंन बधे हुए नहीं, नाक में  नथनी। एक दुल्हन के भाँती लगती है। हाथ में खंजर है, लेकिन सुरक्षात्मक तरीके से पकड़ा हुआ। नाक में नथनी यानी समर्पण, अर्थात धर-गृहस्ती में प्रवेश करने को राज़ी। दुर्गा सिंह पे सवार है, बाल अभी बंधे नहीं, खुले हुए है। इसका मतलब, यदि शक्ति को उचित सम्मान नहीं मिला तो, वह फिर भयानक और खूंखार काली बन सकती है।

दुर्गा अपनी  शक्ति से महिषासुर का वध करती है, जो कि किसी पुरुष के वश की बात नहीं थी। महिषासुर जबरजस्ती दुर्गा से शादी का प्रयास करता है, यानि अपने वश में करने का प्रयास करता है, और दुर्गा उसका विनाश कर देती है, जो कि नारी शक्ति को दर्शाता है। 

जो भी प्रकृति ( दुर्गा ) को जबरजस्ती कब्ज़े में रखने का प्रयास करेंगा उसका विनाश निश्चत है। इसिलए हम उन्हें माँ के सिवाय किसी और  रूप में नहीं पूज सकते। महिषासुर का वध, यानि अपने अंदर छुपे असुर का वध। अब शक्ति अपने अंदर के विनाशक असुर का वध कर चुकी है। असुरो का वध, यह भी इशारा है कि फसल काटने का समय  गया।असुर पताल लोक में रहते है,और फसल भी जमीन के नीचे से निकलती है।

अब शिव की शादी गौरी (अन्नपूर्णा) के रूप में शक्ति से हो जाती है।  शक्ति हरी साडी, बाल सजे-सवरे और बधे हुए,बिना किसी हथियार के| यह पूर्ण समर्पण के प्रतिक है। अब अन्नपूर्णा, माँ  के रूप में अपने बच्चो  को अन्न प्रदान कर रही है।
    
दुर्गा द्धारा  महिषासुर का नाश होने के पश्चात् हीशिव, जो कि आत्मा और परमात्मा के स्वरुप है, शक्ति को प्राप्त होते है। नवदुर्गा का  अंतिम रूप सिद्धिदात्री  है।  आप सिद्धि तभी प्राप्त कर सकते हैजब आपके अंदर के असुर नष्ट हो चुके हो चुके होते है ,और दैविक शक्ति का आगमन हो चूका होता है।

अपने-आप को मिटा देना ही सिद्धि की प्राप्ति हैपरमात्मा का मिलन है। अपने-आप को मिटाना, मतलब, अपने अंदर के असुरी प्रवृति और झूठे अहंकार को मिटाना, अपने अंदर के महिषासुर को मिटाना।









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