क्या गंगा स्नान सचमुच मुक्ति का मार्ग है?

Published in Dainik Awantika, 18 Feb 2013

गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी मानी जाती है। गंगा को माँ करके सम्मान दिया जाता है। गंगा स्वर्ग से उतरकर पृथ्वी लोक आती है, और फिर पताल लोक, और  पुन: स्वर्ग लोक चली जाती है। इसतरह गंगा तीनो लोको में बहती है। विभिन्न-विभिन्न पौराणिक कथाएँ यह बताती है कि गंगा स्नान करने से या पितृ के राख को गंगा में श्राद्ध करने से मुक्ति का द्वार खुल जाता है, और स्नान करनेवाला स्वर्ग में निवास करता है। भागीरथी अपने परदादा सागर को मुक्ति दिलाने और उनके अधूरी सपने को पूर्ण करने के उद्देश्य से गंगा को पृथ्वी पर लाये। तबसे यह परंपरा चलती आ रही है। उस समय जब पृथ्वी पर गंगा आई होगी, तो उस समय के लोग भी पवित्र होंगे, और मुक्ति के लिए सारे पुण्य काम भी किये होंगे, और अनजाने में यदि कोई गलती हो गयी होगी तो गंगा स्नान से क्षमा हो जाएँगी। हड्डी की राख को गंगा में प्रवाहित किया जाता है। और इसमें उर्वरक शक्ति भरपूर होती है। गंगा की पानी का इस्तेमाल भारत के बहुताय इलाको में सिचाई के काम में लाया जाता है। हो सकता हो, कि इस परंपरा का मकसद भारत के कृषि  वाले इलाको को भरपूर उर्वरक प्रदान करना हो। उस समय तक वैज्ञानिक खाद का खोज नहीं हुआ था। सारे फसल जैविक खाद पर ही निर्भर थे।

अगर सिर्फ गंगा स्नान से मुक्ति मिल जाती तो, यह बहुत अच्छी बात है। खूब अन्याय और पाप करो और गंगा के जाकर पुण्यात्मा बन जायो और मुक्ति पालो। बहुत ही सहज है। लेकिन बात ऐसी नहीं है। अगर ऐसी बात होती तो , सारे मछलियाँ, मगरमच्छ, धडियाल आदि जो चौबीस घंटे गंगा जल में ही  रहते है, उनको तो तुरंत मुक्ति मिल जानी चाहिए। गंगा जल प्रतिक है, स्वच्छता और पवित्रता का। यह इशारा है इंसान के हृदय,  मन और आत्मा को स्वच्छ और पवित्र करने का। मुक्ति का द्वार तभी खुल सकता है, जब आपका हृदय,  मन और आत्मा गंगा जल जैसी  स्वच्छ और पवित्र हो। तभी  गंगा की तरह आप भी पृथ्वी से स्वर्ग लोक जा सकते है। गंगा जल में शरीर स्नान से कोई फायदा नहीं है। यह सबको पता है कि शरीर इधर ही रह जानी है।
उलटे में हम अपने शरीर की गन्दगी से गंगा को प्रदूषित कर रहे है।

जहाँ स्वच्छता और पवित्रता है, गंगा का निवास वही  है। "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी है .. संत रविदास एक मोची थे। कुछ लोग गंगा स्नान करने जा रहे थे, एक का चप्पल रास्ते में टूट गया। वह रविदास के पास चप्पल सिलवाने गया। वह राहगीर ने रविदास से पूछा  कि  तुमने कितनी बार गंगा में स्नान किया है। संत रविदास बोले एक बार भी नहीं। राहगीर गुस्से से बोला  कि तुम कितने पापी हो, एक बार भी गंगा में स्नान नहीं किया। राहगीर पैसे देने लगा, तो संत बोले की मैं राहगीरों से पैसे नहीं लेता, और उन्होंने अपने झोले से एक सुपारी राहगीर को देते हुए बोले की, आप इसे गंगा माँ को दे देना। राहगीर स्नान करने के बाद अंत में भारी मन से, उसने सुपारी को गंगा में डालने की कोशिश की तभी, गंगा जी ने पानी से अपने हाथ निकाल कर, सुपारी ले लिए और बदले में एक सोने का कंगन रविदास के लिए दे दिए। राहगीर को बड़ा आश्चर्य लगा। सोचा क्यों न यह कंगन बनारस के राजा  को दे दिया जाए, और अपनी झूठी शाख़ जमाया जाए। राहगीर ने कंगन राजा को दे दिया और  राजा ने यह कंगन अपनी रानी को दिखाया, इतनी सुन्दर कंगन देखर रानी बहुत खुश हुई,और दूसरा कंगन राहगीर से लाने को बोली।  राहगीर के पसीने छूटने लगे कि उसका ढोंग अब पकड़ा जायेंगा, इसलिए सच-सच सब कुछ बता दिया। राजा सहित सभी लोग संत रविदास के पास पहुचे, और दूसरा कंगन गंगा जी से मँगवाने का आग्रह किये। संत रविदास ने बगल में रखे एक पानी के  पात्र में हाथ डाला और गंगा जी ने दूसरा कंगन भी रविदास को भेंट कर दी। यह भक्ति और श्रद्धा देखकर राहगीर बहुत शर्मिंदा हुआ, और रानी उनका भक्त बन गई। बात गंगा में स्नान करने की नहीं है, बात श्रद्धा, स्वच्छता और पवित्रता का है। यह तो कही भी रहकर प्राप्त किया जा सकता है।

फिर कुम्भ मेला या तीर्थ स्थान जाकर लोग अपने-आप को मौत को गले क्यों लगा रहे है? धार्मिक व्यक्ति तो एकांत पसंद करता है, फिर यह भीड़ का भाग क्यों बनता है? वह कैसा धर्म-स्थान व धार्मिकता जहाँ पर प्रशासन लाठी या बल प्रयोग कर लोगो को व्यवस्थित करने में लगी है?  मुक्ति गंगा स्नान से नहीं, मुक्ति तो स्वयं को जानने से मिलती है। और  स्वयं को जानने के लिए एकांत चाहिए न की भीड़।



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