एक महामूर्ख बना महाज्ञानी


एक गाँव में पप्पू नामक एक यूवक रहता था । उसको लोग महामूर्ख समझते थे । जो भी कुछ बोलता था, उसपर लोग हँस देते थे, उसका मजाक उड़ाते थे । बोलता था, तो भी उसका मजाक उड़ता था, न बोले तो भी लोग उसपर हँसते थे। कुछ करे तो भी मुसीबत, ना करे तो भी मुसीबत। लोगो ने उसका जीना हराम कर दिये थे । हँसे तो समस्या, रोये तो समस्या । करे तो क्या करे, बोले तो किससे बोले। ना कोई सुनने वाला, ना कोई समझने वाला ।

सामान्यतया, लोगो को दूसरो में गलती ढूढने और उसका मजाक बनाने में बहुत आनंद आता है । दरअसल, ऐसे लोग अपनी गलती छुपाना चाहते है। यदि कोई व्यक्ति अक्सर कोई दूसरे व्यक्ति का बुराई या मजाक बना रहा है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वह व्यक्ति स्वयं ही बहुत से बुराइयों से भरा हुआ है । कोई उसका बुराई ना परख ले, इसके पहले वह दूसरे की बुराई और निंदा में लिप्त हो जाता है । बुराई - बुराई को ही ढुढता है, और अच्छाई- अच्छाई को । अगर आप बुराईयो  से भरे हो तो, आप दूसरे में अच्छाईया  देख ही नहीं सकते।

पप्पू बहुत ही परेशान रहने लगा। लोगो से बचने लगा। इस उपाय की खोज में, एक सन्यासी के आश्रम में गया, और अपनी व्यथा सुनाई। सन्यासी बोला - गाँव जाओ, और जब भी कोई कुछ बोले, तुम बिना सोचे- समझे उसका उल्टा बोलना । अगर कोई बोले - चाँद सुन्दर है, तुम बोलना - खाक चाँद सुन्दर है, देखो कितना दांग है उसमे । कोई सुंदरता की बात करे तो तुम दांग की बात करना । कोई शांति की बात करे तो तुम दंगे की बात करना।  कोई बोले की भगवान है, तो तुम बोलना भगवान नहीं है। कोई जिद्द करे तो बोलना - सिद्ध करके दिखाओ । भगवान नहीं है, यह सिद्ध करना आसान है, लेकिन भगवान है, यह सिद्ध किया ही नही जा सकता, क्योकि भगवान को  आखो से देखा नही जा सकता। जो आँखों से देखा नहीं जा सकता, उसको सिद्ध करना असंभव-सा है।


कुछ सकारात्मक सिद्ध करने के लिए, तपस्या की जरूरत होती है, प्रयास करनी पड़ती है, मेहनत की आवश्यकता होती है, खोज-बीन करनी पड़ती है। लेकिन, नकारात्मक सिद्ध करने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता है, बस सवाल पे सवाल करते जाओ।

कोई बोले की ऑक्सीजन है, तो तुम  बोलना कि ऑक्सीजन नहीं है, अगर है तो दिखाओ। पीछे बिलकुल नहीं हटना, डट जाना, निर्लज्ज हो जाना, पीछे पड़ जाना कि सिद्ध करो। देखना - लोग तुमसे भागना शुरू कर देंगे । और ऐसा ही हुआ । वह जिस रास्ते से जाता था, लोग रास्ता बदल देते थे कि कौन मुसीबत ले इससे। अगर कोई मिल जाये तो पूछता था, क्या कर रहो, जवाब मिलने पर बोलता था - क्यों कर रहे हो? लोग परेशांन  होने लगे उससे, लोगो की बोलती बंद कर दिया था वह ।

उसकी चर्चाये चारो ओर होने लगी, उसको ख्याति मिलने लगी। लोग उसको वाद-विवाद प्रतियोगिता में बुलाने लगे। उसको सिर्फ एक ही ज्ञान था कि जो भी कोई कुछ बोले उसका नकारात्मक बोलना है। जब वह बोलता था तो लोगो के पास जवाब ना होता था, लोग एक सकारात्मक बोलते थे, तो वह चार नकारात्मक पॉइंट बोलता था। स्रोता उसको ज्ञानी समझने लगे थे। इसतरह से वह लोगो के नज़रो में महाज्ञानी बन गया ।  

कुछ दिनों के बाद, वह उस सन्यासी से मिलने गया । आगे-आगे वह चल रहा है और पीछे-पीछे लोगो की  भीड़ । एकबार सन्यासी भी आश्चर्य में पड़ गया कि क्या यह वही महामूर्ख है जिसको लोग आज ज्ञानी समझ रहे है । ऐसे ही हमारे समाज के महामूर्ख ज्ञानी बन के  घूम रहे है, और लोग उसकी पूजा कर रहे है। राजा बना के बिठा दिए है, और वह हमपे राज कर रहे है।








Comments

Popular posts from this blog

Trinity God as Electrons, Protons and Neutrons

Sons and Daughters of Shiva and Shakti

Why was the arrow-bed given to Bhishma?