...क्योंकि समय सौदा नहीं करता

एक सेठ बहुत ही धनाढ्य था। धन इकठ्ठा करने के लिए उसने बहुत ही मेहनत किया था।  अधिक से अधिक धन इकठ्ठा करना ही सिर्फ उसका लक्ष्य था। पैसा होने के बावजूद भी वह  पुराने और फटे कपडे से काम चला  लेता था। उसके ज़िन्दगी का एक-एक पल कैसे समाप्ति की तरफ बढ  गया, उसको यह कभी पता न चला। ज़िन्दगी की आखिरी पड़ाव मौत ही होती है, यह तो भूल ही चूका था। उसके सोच में तो पैसा और दौलत से सब कुछ पाया और ख़रीदा जा सकता था। मौत तो  अपने समय की पाबंद है। सेठ एक दिन बहुत बीमार पड़  गया। बड़े से बड़े अस्पताल में उसका इलाज़ कराया गया, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार न हुई। अपनी इलाज़ के लिए सेठ अब कोई भी कीमत देने को तैयार था । ताज्जुब  तो यह है कि मनुष्य पहले स्वास्थ्य खोकर दौलत कमाता है , और फिर अंत में दौलत खोकर स्वास्थ्य पाना चाहता है। सेठ का अंत समय आ चूका था। कोई दवा,कोई इलाज़ काम नहीं कर रहा था। यमराज के दूत सेठ के सामने आ गए, सेठ बहुत घबराया, और सोचा अभी तो मैंने अपनी ज़िन्दगी तो जी ही नहीं कि मौत सामने आ गई।

सेठ समय के सामने एक प्रस्ताव रखा कि मुझसे  दस करोड़ ले लो और मुझे कुछ वक़्त और दे दो, मु झे अपनी जिंदगी ज़ीने के लिए। समय बोला ... नहीं हो सकता। सेठ बोला ... मेरी आधी दौलत ले लो और मुझे कुछ और वक़्त दे दो। समय बोला ... नहीं हो सकता। सेठ बोला ... मेरी पूरी दौलत ले लो और मुझे कुछ वक़्त और दे दो, मैं अपनी जिंदगी नहीं जी पाया हू, मूझे अपनी जिंदगी जीने का मौका दे दो। समय बोला ... मैं समय हू , मैं सौदा नहीं करता, मैं किसी का पाबंद नहीं हू, लोग मेरा इंतज़ार करते है, मैं किसी के लिए भी नहीं ठहरता, मैं शाश्वत हू। मैं सबको बराबर का हक देता हू, मैं सबके लिए समान हू। जो मेरा आदर करता है, और मेरे अनुसार चलता है, उसको दुनिया की सारी  ख़ुशी मिलती है। और जो मुझे तिरस्कार करता है, और मुझे अपना पाबंद बनाना चाहता है, उसको अंत में दुःख के सिवाय कुछ भी नहीं मिलता, मैं समय किसी का गुलाम नहीं होता। इसी बीच, सेठ  के दरवाजे पर मौत की घंटी बजी और यमराज़ के दूत, सेठ के प्राण निर्धारित समय पे ले कर चले गए।


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