कथनी और करनी भिन्न क्यों ?

पंडित संतराम एक पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति थे। शास्त्रों के ज्ञाता थे। राम नाम की माला जपने में तो उनका कोई मुकाबला न था। आस-पड़ोस के लोग उनको गुरूजी या महात्मा कहकर सम्मान देते थे। वे दान देने की महिमा सबको बताते थे। आत्मा-परमात्मा की ज्ञान बाटते थे। रोज़ की भांति, वे एक दिन माला जपने में मग्न थे, उसी वक़्त एक कोढ़ी भिखारी उनके दरवाजे पर भिक्षा मांगने पहुँच गया, और जोर से बोला, "दे दे दाता के नाम पे दे दे कुछ , ईश्वर सबकी भला करेंगा।"

पंडित संतराम को इस तरह चिल्लाना बिल्कुल रास  नहीं आया। पंडितजी बाहर  आ गए और   बरस पड़े उस बेचारे भिखारी पर ," तुम्हें अक्ल नहीं है, भगवान के भजन-प्रार्थना में विध्न डालते हो, इसीलिए ईश्वर ने तुम्हे इस तरह भिखारी और नीच जाति का बनाया है।"  भिखारी बोला,  " पंडितजी क्षमा चाहता हूँ, मगर क्या आप यह बता सकते हैं, कि किस प्रमाणिक शास्त्रों में जाति या वर्ग का विभाजन लिखा है, या ईश्वर ने किसी इन्सान को कोई जाति का लेबल लगाकर पृथ्वी पर भेजा है ?" बात तो सत्य थी, कोई भी शास्त्र या धर्म इसको प्रमाणित नहीं करता। धर्म या शास्त्र तो सिर्फ कर्मो की बात करता है। पंडितजी थोडा क्रोधित हुए, और सहमे भी, क्योंकि जो इन बातो को प्रमाणित करे, ऐसी कोई शास्त्र या दैविक निर्देश तो है नहीं। जाति या वर्ग विभाजन तो सामाजिक प्रक्रिया है, इसको शास्त्रीय, धार्मिक या दैविक प्रमाणिकता देना मूढ़ता से ज्यादा और कुछ भी नहीं।

पंडितजी थे, शास्त्रों के ज्ञाता थे, थोड़ी अकड़ तो थी हि उनमें। उन्होंने अपने पुत्रों को पुकारा और बोला " यह भिखारी मुझसे बराबर का जुबान लड़ा रहा हैं। अपने से नीच जाति और वर्ग का मालूम होता है, इसे यहाँ से बाहर निकाल दो, इसने तो मेरा धर्म और घर अशुद्ध कर दिया।" उनके पुत्रो ने ऐसा करने से इन्कार कर दिये, और बोले, "पिताजी आप ही तो कहते है कि ईश्वर सबके ह्रदय में निवास करता है। क्या यह भिखारी उन लोगो में से नहीं है? शास्त्र कहता है कि ईश्वर की दृष्टी में तो कोई ऊँच-नीच या अमीर-गरीब नहीं हैं, तो हम कौन होते हैं, यह भेद-भाव करनेवाले?" यह सुनकर पंडितजी अवाक् रह गये।
सच में, धार्मिक वह नहीं, जो धर्म की बात करता है, बल्कि धार्मिक वह है जो धर्मं का अनुसरण करता है। बाहर की माला फेरने से कुछ नहीं होता हैं, जब तक कि अंदर की गंदगी साफ़ न हो। तभी तो कबीर कहते है:--
                     
माला फेरत युग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डाल दे, मन का मनका फेर।।

करनी और कथनी में भिन्नता रखने वाला व्यक्ति धार्मिक या पंडित(विद्वान) कहलाने योग्य नहीं होता।
इसपर तुलसी दास कहते हैं:--
         
कथनी करनी भिन्न जहाँ है।
धर्म     नहीं    पाखंड   वहाँ   है।।



    

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